आत्म-अनुशासन एक आवश्यक आदत है। यह केवल इच्छाशक्ति पर निर्भर नहीं करता है। यह एक ऐसे मानसिक ढाँचे का निर्माण करता है जो सही विकल्पों को स्वचालित रूप से अपनाने में सक्षम बनाता है।

आत्म-अनुशासन के नियम केवल प्रेरणा के लिए नहीं होते हैं। ये अच्छी तरह से जीवन जीने के तरीके में बदलाव के लिए होते हैं।

हम इस लेख में यहां केवल पांच नियमों की बात करेंगे।

पहला नियम

जो हम नियंत्रित कर सकते हैं उसे हमें नियंत्रित करना है, और जो हम नियंत्रित नहीं कर सकते हैं उसे छोड़ देना है।

इसके लिये हमें बस इतना करना है कि हम उन मामलों की पहचान कर लें कि कौन-सी बाहरी चीजें हमारे नियंत्रण में नहीं हैं, और कौन से उन विकल्पों से संबंधित हैं जिन्हें हम वास्तव में नियंत्रित करते हैं।

हमें याद रखना है कि हम अपने विचारों, अपने कार्यों और अपनी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित कर सकते हैं। हम परिणामों, दूसरों की राय या बाहरी घटनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं। बाज़ार हमारी अनुमति के बिना ही चलेंगे। लोग हमारे प्रयासों के बावजूद हमारा मूल्यांकन करेंगे।

जब हम इन बाहरी ताकतों से लड़ना बंद कर देते हैं, तब हमारी ऊर्जा उन चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मुक्त हो जाती है जिन्हें हम प्रभावित करते हैं।

दूसरा नियम

भावनाओं के बजाय हमें कार्यों को चुनना है।

हमें याद रखना है कि हमारा अपने मन पर नियंत्रण है, बाहरी घटनाओं पर नहीं।  जितनी जल्दी हम यह समझ जाएंगे उतनी जल्दी हमें अतिरिक्त आत्म-शक्ति मिलनी शुरू हो जायेगी।

हमारी भावनाएँ हमारी अविश्वसनीय मार्गदर्शक होती हैं। एक सुबह, हम प्रेरित होकर दुनिया जीतने के लिए तैयार होकर उठते हैं। अगली सुबह, हम मुश्किल से खुद को बिस्तर से बाहर खींच पाते हैं।

हमें नहीं भूलना है कि अगर हम कोई कदम उठाने से पहले सही भावना का इंतज़ार करते रहेंगे तो हम हमेशा के लिए इंतज़ार ही करते रह जायेंगे।

तीसरा नियम

इच्छाशक्ति को मजबूत करने के लिए आनंद में देरी करना है।

हमें अपने दिमाग में बैठा लेना है कि किसी भी व्यक्ति के पास वह सब कुछ पाने की शक्ति नहीं होती है जो वह चाहता है, लेकिन यह उसकी पकड़ में है कि वह जो नहीं है उसे न चाहे, और जो उसके पास है उसका प्रसन्नतापूर्वक अच्छा उपयोग करे।

हमें याद रखना है कि तात्कालिक संतुष्टि हमें कमज़ोर बनाती है। हर बार जब हम कठिन लेकिन बेहतर विकल्प के बजाय आसान की ओर बढ़ते हैं, तब हम खुद को नरम बनने के लिए प्रशिक्षित करते हैं।

क्या हम नहीं जानते हैं कि एक मांसपेशी प्रतिरोध के विरुद्ध विकसित होकर मजबूत बनती है?

आनंद में देरी का हमारा मतलब खुद को आनंद से वंचित करना नहीं है। इसका मतलब है कि हम अल्पकालिक राहत के बजाय दीर्घकालिक संतुष्टि को चुनें।

हर बार जब हम तात्कालिक सुख-सुविधाओं का विरोध करते हैं, तो हमारे अंदर कुछ बदलाव आता है। हम खुद को साबित करते हैं कि हम आसान चीज़ों के बजाय बेहतर चीज़ों को चुनने में सक्षम हैं। इससे मानसिक दृढ़ता का निर्माण होता है। यह मानसिक दृढ़ता हमारे जीवन के हर क्षेत्र में काम आती है।

नहीं भूलना है कि देर से मिलने वाले फल अक्सर तुरंत मिलने वाले फल से ज्यादा मीठे होते हैं।

चौथा नियम

हमें स्वैच्छिक असुविधा का अभ्यास करना है।

हम सभी जानते हैं कि कल्पना की दुनिया में जब हम ज्यादा देर रहते हैं तो वास्तविकता की अपेक्षा अधिक कष्ट सहते हैं।

आराम हमें कमज़ोर बनाता है। जब हम हर अप्रिय अनुभव से बचते हैं, तब हम चुनौतियों का सामना करने की अपनी क्षमता उस समय खो देते हैं, जब वे बिना बुलाए आ जाती हैं। जब हम असुविधा को चुनते हैं, तब हम खुद पर नियंत्रण रखने की शक्ति खो देते हैं।

जब हम मुसीबत से निबटने की तैयारी किये रहते हैं तब मुश्किल वक्त आने पर हमारा मन हमारी असहजता को झेल जाता है। हम मुश्किल के पहले संकेत पर घबराते नहीं हैं क्योंकि हमने खुद को चुनौती का सामना करते हुए शांत रहने के लिए प्रशिक्षित कर लिया होता है।

पांचवां नियम

अपनी बात अपने तक ही रखनी है।

इसके लिये जरूरी है कि हम पहले अपने आप से कहें कि हम क्या बनना चाहते हैं; और फिर वह करें जो हमें करना है।

हमें अपनी इस आदत से बचना है कि हम दूसरों से वादा करें और खुद से किए वादे तोड़ दें। हम अपने कर्मचारी से आशा करें कि वह समय के अंदर काम पूरा करे, लेकिन निजी तौर पर हम अपने से की गई प्रतिबद्धताएँ असुविधाजनक लगते ही छोड़ दें, यह अच्छी बात नहीं हैं। इस प्रकार की आदत आत्म-अनुशासन को जड़ से खत्म कर देती है।

ईमानदारी आत्मविश्वास से शुरू होती है। अगर हम खुद से किया गया एक छोटा-सा वादा भी नहीं निभा सकते हैं, तो किसी भी मुश्किल काम को करने के लिए खुद पर भरोसा कैसे कर सकते हैं?

मत भूलिये कि हर टूटा हुआ वादा इस बात का सबूत देता है कि हम अविश्वसनीय हैं।

वादे की विषयवस्तु उसे निभाने के तरीके से ज्यादा मायने रखती है। ऐसा करके हम सिर्फ़ आदत नहीं बना रहे होते हैं बल्कि खुद पर फिर से भरोसा बना रहे होते हैं।

हर निभाया हुआ वादा इस बात का सबूत है कि हम अपने वादे पर खरे उतरते हैं।

यह सबूत समय के साथ जमा होता जाता है, और आखिरकार, हम एक ऐसे इंसान बन जाते हैं जिस पर हम खुद भरोसा कर सकते हैं।

जब हम खुद पर भरोसा करते हैं, तब हम में आत्मविश्वास अपने आप आ जाता है। हमारे अंदर यह संदेह आना बंद हो जाता है कि हम जो कहते हैं, वह करेंगे या नहीं, क्योंकि तबतक हमारी विश्वसनीयता का ट्रैक रिकॉर्ड बन चुका होता है।

संक्षेप में हमारी राय है कि हम इन पाँच नियमों को बहुत जटिल न समझें। इन्हें सरल, व्यावहारिक और बेहद प्रभावी मानकर अपनाएं। हम न भूलें कि आत्म-अनुशासन कोई ऐसा विशेष गुण नहीं है जो हमारे पास नहीं है। हमें यह नहीं सोचना है कि आत्म-अनुशासन को हमें किसी से सीखना है। हमें बस यह मानना है कि यह एक ऐसा कौशल है जिसे हमें अपने अंदर खुद से विकसित करना है।

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