आजकल चारों ओर जेन जी शब्द की गूंज है। हर कोई इसे एक अजूबा समझ बैठा है। यह शब्द पश्चिमी दुनिया की पीढ़ियों को बांटने की कम, उनमें कटुता पैदा करने की एक सोची-समझी चाल है। कैसे संयुक्त परिवारों के बीच में विघटन पैदा किया जाये, इसका बस एक ही उद्देश्य है।
आज की नयी पीढ़ी यानि जेन जी के सवाल, उनकी असहमति और उनका बेबाक अंदाज़ अक्सर समाज में चर्चा और चिंता का विषय बना रहता है। कई बार बड़े-बुजुर्गों या पुरानी सोच के लोगों को लगता है कि यह पीढ़ी दिशाहीन हो रही है या परंपराओं का अनादर कर रही है, लेकिन ऐसा नहीं है।
इतिहास गवाह है कि भारत की मूल संस्कृति में तर्क, प्रश्न और जिज्ञासा को कभी अपराध नहीं माना गया है। इसे इसके उल्टे ज्ञान-प्राप्ति का सबसे बड़ा साधन माना गया है।
हम इसे साहित्यिक भाषा में जिज्ञासा से समाधान की ओर गमन कह सकते हैं। प्राचीन काल में, जब शिक्षार्थी अथवा कोई ज्ञानी अपनी शंकाओं का समाधान चाहता था, तब वह विद्वानों की सभा में प्रश्न पूछता था। प्रश्न पूछना उसका कर्त्तव्य था और जिससे वह प्रश्न पूछता था, उसका कर्त्तव्य होता था कि वह प्रश्नकर्त्ता के प्रश्नों का समुचित उत्तर देकर उसकी जिज्ञासा को शांत करे। इसे कालांतर में शास्त्रार्थ भी कहा गया, जहां विद्वान एक-दूसरे से प्रश्न पूछकर अपनी जिज्ञासायें शांत करते थे और अपनी विद्वता भी सिद्ध करते थे।
हमें नहीं भूलना चाहिये कि प्राचीन भारत में युवकों और युवतियों का सभाओं में कठिन प्रश्न पूछना न केवल स्वीकार्य था, बल्कि अत्यंत सम्मानजनक माना जाता था। हम कुछ उदाहरण यहां लिख रहे हैं जो बड़े ही स्पष्ट हैं कि प्रश्न पूछने वाला कितना महत्वपूर्ण माना जाता था।
पहला उदाहरण बालक नचिकेता है। बालक नचिकेता ने यमराज से मृत्यु और आत्मा का गूढ़ सत्य पूछने का साहस किया। उसके प्रश्न इतने सटीक और अडिग थे कि यमराज को भी उन्हें आत्मज्ञान देना पड़ा।
दूसरा उदाहरण गार्गी का है। राजा जनक की भरी सभा में विदुषी गार्गी ने महान ऋषि याज्ञवल्क्य को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी और गहन दार्शनिक प्रश्न पूछे। उसकी जिज्ञासा ने उसे अमर बना दिया।
तीसरा उदाहरण मैत्रेयी का है। बृहदारण्यक उपनिषद की कथा के अनुसार महान ऋषि याज्ञवल्क्य जब अपना आश्रम त्याग रहे थे, तब उनकी पत्नी मैत्रेयी ने भौतिक संपत्ति के बजाय आत्मज्ञान और अमृत्व का मार्ग पूछा। उसने कहाः
येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम्?
इसका भाव था कि जिससे मुझे अमृत्व न मिले, उसका मैं क्या करूँ?
यह जीवन के उद्देश्य पर एक अत्यंत गहन और अमर प्रश्न था।
चौथा उदाहरण सत्यकाम जाबाल का है। छांदोग्य उपनिषद में कथा है कि एक बालक, जिसकी जाति और गोत्र का पता नहीं था, उसने महर्षि गौतम की सभा में जाकर पूरी सत्यनिष्ठा से प्रश्न पूछे और शिष्य बनने की इच्छा जताई। उनके सत्यवादी दृष्टिकोण और अटूट जिज्ञासा से प्रसन्न होकर महर्षि ने उन्हें अपना शिष्य स्वीकार किया।
पांचवां उदाहरण राजा जनक का है। यह प्रसंग जनक-अष्टावक्र संवाद के रूप में विख्यात है।
मिथिला के राजा जनक अपनी राजसभा में विद्वानों को आमंत्रित किया करते थे और स्वयं एक विद्यार्थी की तरह मुक्ति, ज्ञान और वैराग्य से जुड़े गूढ़ प्रश्न पूछते थे। अष्टावक्र के साथ उनका संवाद भारतीय दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।
छठवां उदाहरण शुकदेव जी महाराज का श्रीमद्भागवत में है। शुकदेव जी महर्षि वेदव्यास के पुत्र थे। उन्होंने कम उम्र में ही गंभीर दार्शनिक प्रश्न उठाए और सत्य की खोज में आगे बढ़े। राजा परीक्षित के सभा-सदन में उनके संवाद और उत्तर ज्ञान के महान स्रोत बने।
सातवां उदाहरण बालक ध्रुव का है। विष्णु पुराण में प्रसंग है कि बालक ध्रुव ने अपनी सौतेली माँ के कटु वचनों से दुःखी होकर ईश्वर के अस्तित्व और परम पद को प्राप्त करने के विषय में प्रश्न उठाए और कठिन तपस्या के बल पर अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त किया।
आधुनिक भारत में प्रश्न पूछने का सबसे बड़ा उदाहरण स्वामी विवेकानंद का है। स्वामी विवेकानंद ने भी केवल माना नहीं, बल्कि जाना। उन्होंने हर धर्मगुरु से सीधे सवाल किया कि क्या आपने ईश्वर को देखा है? इस अटूट जिज्ञासा ने उन्हें विश्वविजेता बनाया।
जब हमारी परंपरा में प्रश्नों का इतना ऊँचा स्थान रहा है, तो आज की युवा पीढ़ी के तीखे या अपरंपरागत प्रश्नों से डरना कैसा?
हमें डरने के बजाय उनकी जिज्ञासाओं के समाधान की कोशिश करनी चाहिये। ऐसी कौन-सी जिज्ञासा है जिसका समाधान संभव नहीं है? जब मानव काल्पनिक मस्तिष्क बना सकता है तब प्रश्नों का उत्तर देना कौन-सी बड़ी बात है?
जेन जी डिजिटल युग में पली-बढ़ी है। उनके पास सूचनाओं का भंडार है, इसलिए वह क्योंकि मैंने कहा है वाले तर्कों को आसानी से स्वीकार नहीं करती है। उनके सवालों से घबराने या उन्हें दबाने के बजाय, बड़ों और समाज को समाधान की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए।
उनसे सहानुभूति और खुला संवाद, उनकी मानसिकता को समझने के लिए उपयोग किया जा सकता है। उनसे संवाद के रास्ते बंद नहीं करना चाहिये। जब वे प्रश्न पूछें, तो उसे बगावत मानने के बजाय जिज्ञासा के रूप में देखना चाहिये। हां, उनकी उद्दण्डता का समर्थन नहीं करना चाहिये।
यदि आज के युवाओं में दिशा भटकने या डिजिटल भटकाव के लक्षण दिखते हैं, तो उन्हें डांटकर या जबरन नियंत्रित नहीं किया जा सकता। सही और गलत का अंतर स्पष्ट तर्कों के साथ समझाना होगा।
मार्गदर्शन वह विधि है जिससे उनकी ऊर्जा और नई सोच को सही दिशा दिया जा सकता है। हमें उन्हें रचनात्मक और राष्ट्र-निर्माण के कार्यों की ओर मोड़ना चाहिये।
हमें नहीं भूलना चाहिये कि संदेह और प्रश्न परिवर्तन की शुरुआत के लक्षण होते हैं। जेन जी के मन में उठते सवाल इस बात का संकेत हैं कि वे दुनिया को बेहतर ढंग से समझना चाहते हैं।
यदि हम प्राचीन परंपरा से प्रेरणा लेकर उन्हें डराने या चुप कराने के बजाय, धैर्यपूर्वक उनके प्रश्नों के उत्तर दें और सही दृष्टिकोण अपनाएं, तो यही पीढ़ी देश और दुनिया को एक नई और प्रगतिशील दिशा दे सकती है।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि मैत्रेयी का अमृत्व विषयक प्रश्न हो, बालक सत्यकाम जाबाल की सत्यनिष्ठ जिज्ञासा हो, या राजा जनक द्वारा अपनी ही सभा में पूछे गए दार्शनिक सवाल हों, इन सबका एक ही लक्ष्य है कि हमारी संस्कृति में प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता ही ज्ञान के नए द्वार खोलती है।
विद्वता किसी एक व्यक्ति की विरासत नहीं होती है। विद्वता को समय-समय पर परिष्कृत और सराहनीय बनाना पड़ता है। यह बड़ा कठिन कार्य है, पर करना तो पड़ेगा ही क्योंकि आने वाली पीढ़ी हमसे आगे की सोचती है, हमसे अधिक विद्वान बनना चाहती है, हमसे आगे जाना चाहती है और वह भी बहुत जल्दी।